ravan ka janam in hindi

 

 

हिंदू धर्म को मानने वाले लोग रावण को काम क्रोध लोभ अधर्म और बुराई प्रतीक क्यों ना मानते हो और उससे घृणा करते हो परंतु हमें यह नहीं नहीं भूलना चाहिए कि दशानन रावण राक्षस होने के साथ-साथ ज्ञानी भी था ।

जहां आपको बताएंगे की ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले रावण में राक्षस वाली गुण कैसे आ गए-

रामायण हिंदू धर्म का पवित्र ग्रंथ माना जाता है जिसमें श्री राम के संपूर्ण जीवन का वर्णन किया गया है जिसमें रावण की लीला का खास महत्व दिया गया है। रामायण को देखने से ऐसा लगता है कि रावण के बिना रामायण संभव ही नहीं था।

रावण सोने की नगरी लंका का राजा हुआ करता था परंतु कई हिंदू धर्म ग्रंथों में अलग-अलग जानकारी दी गई है। परंतु वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण अनुसार रावण महर्षि विश्वा और केकती का पुत्र था ।

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में लिखे अध्याय के अनुसार पौराणिक काल में माल सुमाली और मालयवन नाम के 3 अत्यंत भयानक भाई हुआ करते थे। तीनों भाइयों ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें अत्यंत बलशाली होने का वरदान दिया ।

ब्रह्मा जी से वरदान मिलने के बाद तीनो भाई ने स्वर्ग धरती और पाताल में देवताओं सहित ऋषि मुनि और मनुष्य पर अत्याचार करने लगे। परंतु जब इन तीनों भाइयों का अत्याचार काफी बढ़ गया तब ऋषि मुनि और देवतागण भगवान विष्णु के पास गए और इसके निवारण का मार्ग पूछने लगे। फिर विष्णु ने कहा कि मैं इन दुष्टों के विनाश अवश्य करूंगा।

उधर जब इस बात की सूचना तीनों भाइयों के पास पहुंची तो तीनों भाइयों ने अपनी सेना सहित इंद्र लोक पर और आक्रमण कर दिया। इसके बाद भगवान विष्णु इंद्रलोक आकर सभी राक्षसों का विनाश करने लगे। भगवान विष्णु के युद्ध क्षेत्र में आने के कुछ देर बाद ही बहुत राक्षस मारे गए और बाकी राक्षस लंका की ओर भागने लगे। उसके बाद कुछ राक्षस सुमाली के नेतृत्व में लंका को छोड़कर पाताल में जा बसे युद्ध में मिली पराजय के बाद बहुत समय तक मालि और मलयवान अपने परिवार के साथ पाताल लोक में छुपा रहा ।

1 दिन सुमाली पृथ्वी लोक पर घूमने आया जहां उसने कुबेर को देखा परंतु देवताओं के भय के कारण कुछ समय बाद ही वफादार लोग चले गया पाताललोक पहुंचकर वह सोचने लगा कि देवताओं के भय से उन्हें कब तक यहां छुप कर रहना पड़ेगा । ऐसा कौन सा उपाय किया जाए जिससे देवताओं को पर विजय प्राप्त की जा सके। कुछ समय बाद उसे कुबेर का ध्यान आया उसके मन में यह विचार आया कि वह अपनी पुत्री का विवाह महर्षि विश्वा से कर दे जिससे उन्हें तेजस्वी कुबेर जैसे पुत्र की प्राप्ति हो जाए फिर उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह महर्षि विश्वा से करा दिया ।

रक्षा स्कूल में जन्म लेने वाले राक्षस की तरह होते हैं अतः महर्षि ने मुझे पहले ही या बात बता दी फिर उन्हें सांत्वना भी दी की उनका तृतीय पुत्र महर्षि विश्वा की तरह ही धर्मात्मा होगा ।


उनका प्रथम पुत्र रावण जिसके 10 सिर थे, दूसरा पुत्र कुंभकरण था, उससे ज्यादा दूसरा कोई इतना लंबा और चौड़ा ना था, तृतीय पुत्री हुई जिसका नाम शूर्पणखा था और चतुर्थ पुत्र विभीषण के नाम से विख्यात है ।

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